Empowering Lives: The Badlav Story Part 2 (in Hindi)

शारद की यात्रा चुनौतियों से भरी थी। अपने पिता के विपरीत जा, शरद ने सामाजिक कार्य में मास्टर्स (स्नातकोत्तर) की पढ़ाई को यूपीएससी की तैयारी से प्राथमिकता दी। समाचार पत्र में एक सामाजिक कार्य कार्यक्रम के लिए अंतिम खाली सीटों के विज्ञापन को पढ़ कर, इस पाठ्यक्रम के लिए नामांकन फॉर्म भर दिया। और अपने बड़े भाई को आश्वस्त भी किया कि ये डिग्री यूपीएससी के लिए उसकी उम्मीदवारी को मजबूत करेगी।


शुरुरात में, शरद ने किसी संगठनात्मक संरचना के बिना काम करने की कोशिश करी, जिसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। भारत में ऐसी कई संस्थाए हैं जो की सामाजिक कार्यो के नाम पर विदेशी पैसे लाते हैं , और वहीँ काफी लोगों का ये मानना हैं की भिकारी नशा करने के साधन के लिए भीख मांगते हैं, ये इन लोगों का धंदा हैं जिसे उन लोगों ने खुद ने चुना हैं । दोस्तों और रिश्तेदारों से प्रोत्साहन तो दूर, उन्होंने शरद को लगातार हतोत्साहित किया और ये तक कहा की अगर वह इस दिशा में काम करते रहे तो वह एक भिखारी बन जाएंगे । हालाँकि, इन आरोपों ने केवल उनके इस उद्देश्य को और अधिक दृढ़ बनाया । इसने उन्हें ये एहसास हुआ कि, वह लोगों की मानसिकता को बदलने की कोशिश कर रहे हैं, और यहीं सही समय हैं की वो कुछ "बदलाव" लाये और जो लोग भिखारियों के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनको भी ऐसी समाज का हिस्सा बनाये और इस समाज में उनको सम्मानजनक तरीके से स्वागत करने में मदद करे।


पहला साल, धैय्र और दृढ़ता की परीक्षा थी! शुरुआत में, शरद को भिखारियों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वो इन्हे एक विदेशी समझ नज़रअंदाज़ करते थे | भिखारियों को भोजन बाटते वक़्त जो उन्होंने दिक्कते महसूस की,उसी से उन्हें ये समझ आया - की विश्वास हासिल करने के लिए शरद को उनमें से ही एक बनना पड़ेगा। फिर क्या थम शरद ने इन लोगों से दोस्ती का रिश्ता बनाना शुरू कर दिया, ताकि वे अपने दुखों को साझा करने और मदद लेने के लिए पर्याप्त सहज महसूस करें। उन्होंने शाम के समय भिखारियों के साथ बिताना शुरू किया। जल्द ही, उन्हें भिखारियों की परेशानियों का और उनके उपायों का पता चला, जैसे राशन कार्ड ! शरद ने इस बात के लिए बहुत कड़ा संघर्ष किया, पते के प्रमाण के बिना, 100 से अधिक भिखारियों को, अधिकारियों की मंज़ूरी सहित, राशन कार्ड प्रदान कराना, असान नहीं था । यह भिखारियों का विश्वास हासिल करने की दिशा में शरद का पहला कदम था। अन्य भिखारी जल्द ही अपने राशन कार्ड के लिए शरद के पास आने लगे। उनकी कोशिश कामयाब होती नज़र आयी, क्योंकि भिखारियों ने उनके साथ अपने दुख साझा करना शुरू कर दिया। अपनी परेशानियों के साथ, वो लोग अपने दोस्तों की मदद करने के लिए आग्रह भी ले कर आने लगे ।

समस्याओ का रास्ता तलाश करते हुए, शरद को पता चला कि सरकार ने कई पुनर्वास केंद्र स्थापित किए हैं । हालांकि, सरकार के प्रयासों के बावजूद यहां कुछ ही लोगों का पुनर्वास हो पाया । जब उन्होंने इन केंद्रों के साथ काम करने की कोशिश करी, तो कई प्रशन सामने आये, जैसे भिखारियों की कुल संख्या , भिखारी क्यों नहीं आते यहाँ ! इन सबका जवाब पाने के लिए उन्होंने खुद भिकारी बन कर रहना तय किया । शरद ने अपनी दाढ़ी और बाल बड़े कर, अपने दोस्त के साथ मिलकर, सड़कों पर रहना शुरू कर दिया। उन्होंने अपना मोबाइल तक घर पर छोड़ दिया । जहन एक ओर, वो अपने ध्यान की यात्रा पर अग्रसर थे, और सड़को पर सोने की जगह ढूढते थे, वहीँ कई बार उनकी सुबह पुलिस के डंडों से होती थी - जो उनको दूसरे इलाकों में जाने को कहते थे ।


भिखारियों के साथ बिताए समय ने शरद को एहसास दिलाया कि हर भिखारी के पीछे एक कहानी है, और भीख मांगने का अलग कारण हैं । जहाँ कुछ लोगों ने अपनी बेटी की शादी में पैसा खो दिया, तो कुछ रोजगार की खोज करते - करते इस राह पर आ गए । हालाँकि, सभी के बीच एक बात समान थी, और वह है गरिमा के साथ जीने और सम्मानजनक जीवन जीने की इच्छा।


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